अब एक लाइन उनके भी नाम लिख रहा हूँ,
कि सजाएँ मुहब्बते तमाम लिख रहा हूँ।।
नादाँ थे हम जब ओ सफ़र लिख रहा हूँ,
कि नाइंसाफी का मै इक जिकर लिख रहा हूँ।।
उनकी कस्मों में खुद को भुलाते रहे,
झूठे रश्मों में हमको लुभाते रहे,
प्याले में ज़हर ओ पिलाते रहे,
हम पीते गए ओ मिलाते रहे,
आग उनकी नहीं थी बुझने लायक,
नासमझ हम भी थे बुझाते रहे,
अपने खुदा से भी की थी फरमाईस हमने
की ये कली कई जन्मो मुस्कुराती रहे,
और ज्यादा क्या लिखूँ मैं क़त्ल हुआ उसी से मेरा,
जिस खंजर में धार हम लगाते रहे,
जीवित है दुनियाँ में ना जाने कैसे अभी भी मुहब्बत,
मै तो ये दास्ताँ अपनी और उसका हुनर लिख रहा हूँ।।
~~~~~~~~~APM
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें