-:मेरे शायरियों की दुनियाँ में आपका स्वागत है:-
यह कोई जरूरी नहीं की सभी पंक्तियाँ हमारी ही घटनाओं से सम्बंधित हैं।
किसी और के विगत जीवन को भी देखते हुए लिखा जा सकता है।
रविवार, 22 दिसंबर 2013
शुभ-संध्या
चलते चलते फिर देखो इक शाम आ गयी,
महक फूलों की निखरी तपन सूरज की ढा गयी,
आ चल कहीं बैठ कर लें बाते दो चार ए सनम,
कहीं छूट ना जाए ये रुत भी हमसे,जो "निशा" के साथ हमारे पास आ गयी।।
~~~~~~~~~APM
……………………
निशा=चाँद।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें