-:मेरे शायरियों की दुनियाँ में आपका स्वागत है:-
यह कोई जरूरी नहीं की सभी पंक्तियाँ हमारी ही घटनाओं से सम्बंधित हैं।
किसी और के विगत जीवन को भी देखते हुए लिखा जा सकता है।
मंगलवार, 17 दिसंबर 2013
नासमझ ना बन ए ज़ालिम
ज़माने को तो तेरे सूरत का जिकर है,
हमें तो तेरी मूरत का फिकर है,
अब नासमझ बन यूँ ना इतरा ए ज़ालिम,
वरना सिमट जाएगा एक दिन,तेरा जितना भी जहर है।।
~~~~~~~~~APM
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