-:मेरे शायरियों की दुनियाँ में आपका स्वागत है:-
यह कोई जरूरी नहीं की सभी पंक्तियाँ हमारी ही घटनाओं से सम्बंधित हैं।
किसी और के विगत जीवन को भी देखते हुए लिखा जा सकता है।
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बुधवार, 5 नवंबर 2014
जख्मों पे जख्म कुछ इस तरह से खाते रहे, हम जख्मों के ही कातिल हो गये।
सुना हूँ जख्म तो भर ही जाते हैं, शुक्र है हम शातिर हो गये।।
~~~~~~~~~ APM
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