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सोमवार, 7 अप्रैल 2014

फुलझड़ी


मैंने भी देखा था एक दिन फुलझड़ी,
फिर प्यार हुआ ऐसा ना पूंछो ओ घड़ी,
बाँहों से बाहें आँखों से आँखे कितनी बार ही लड़ी,
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अब किस्मत की क्या लिखूँ ?
ओ फुलझड़ी थी तो झड़ी ही झड़ी।
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अब बात ये एक दिन आगे ही बढ़ी,
मैंने कहा तू बेवफा है बड़ी,
कह दिया फिर उसने भी एक ही कड़ी,
चीजें हमारी हैं ये, तुमने क्या पढ़ी?
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नाकाम मुहब्बत की मैं गिनता अब लड़ी,
फिर भी ना जाने क्यूँ मिलती है अभी सामने ओ खड़ी।
~~~~~~~~~APM

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