तुम्हारे ही खातिर दुनियाँ से मैं लड़ जाऊँ ,
रहगुजर बस तेरी होगी और सबकुछ भूल जाऊँ '
राय हमे लिख दो अपना तुम भी ऐ ज़नाब,
वर्ना कहीं ऐसा न हो, कल तुम्हारी सौतन तक ले आऊँ।
~~~~~~~~~APM
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मित्रों ये पंक्तियाँ हमे भी थोड़ी अटपटी पर चटपटी लग रही हैं, परन्तु क्या करूँ बहुत प्रयास किया पर और कुछ सूझा ही नहीं।। सादर।।
-:मेरे शायरियों की दुनियाँ में आपका स्वागत है:- यह कोई जरूरी नहीं की सभी पंक्तियाँ हमारी ही घटनाओं से सम्बंधित हैं। किसी और के विगत जीवन को भी देखते हुए लिखा जा सकता है।
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बुधवार, 3 दिसंबर 2014
तेरी रहगुजर
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